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एक हजार वर्ष पूर्व रूस में था हिन्दू धर्म?

(Last Updated On: October 1, 2018)

एक हजार वर्ष पूर्व रूस में था हिन्दू धर्म?

वेबदुनिया पर ये पोस्ट पढ़ा तो कुछ पुराने दिन याद आ लिए !

आज ज्यादातर रुसी नास्तिक है .. मुझे लगता है रुसी ही नही लगभग यूरोप के ज्यादातर देशो के नागरिक भी लगभग नास्तिक ही हो चुके है .. इक्का दुक्का लोग ही चर्च में प्रार्थना के लिए जाते होंगे !

अभी हाल में हुए मिशनरी स्कुल वाले वाकये को देख के लगता है कि इंडिया के जैसे “कट्टर क्रिस्चन” केवल रोम या #वेटिकन में ही मिलेंगे ..

यूरोप में चर्च हर जगह दिख जाएंगे लेकिन उधर जाने लोग ज्यादातर विजिटर्स-पर्यटक होते है या फिर इक्का दुक्का स्थानीय लोग .. एक दो बार मैं भी चर्च गया ये देखने के लिए कि अंदर से फिल्मो जैसा होता है या कुछ अलग ..

शायद इधर चर्च केवल शादी प्रथा के लिए ही मुख्यतः यूज होता है और अब शादी प्रथा भी विलुप्त होते जा रहा है |

सन् 2009 में एक रुसी शादी में शामिल हुआ था .. मैंने सोचा था कि नाम से तो ये सब क्रिस्चन ही है ..चर्च में ही शादी होगी .. लेकिन ऐसा नही हुआ … रजिस्ट्रार या कोर्ट में लिखा पढ़ी के बाद उनके यहा के देश के लिए बलिदान होने वाले सैनिको या क्रान्तिकारियो की प्रतिमाओ के सामने जीवन पर्यन्त साथ निभाने की कसमें खाने की रस्मे हुई और उसके बाद होटल-बार में वर-वधु पक्ष के लोग पिए खाये नाचे गाए और घर को गए .. घर में भी 3-4 दिन-रात केवल वोडका का सामूहिक दौर चला |

दूल्हा मेरा सहकर्मी मित्र था .. दूल्हे से पूछा – सभी लोग इतने दिन से इतना क्यू पी रहे है ?

उसने बताया कि ये रसियन ट्रेडिशन है ..शादी में सभी रिश्ते, नाते वाले या मित्र 3-4 दिन सामूहिक पीते है |

फिर चर्च में शादी पर चर्चा किया कि चर्च में शादी क्यू नही हुई तुम्हारी जैसे दूसरे ईसाई देशो में होता है .. फिल्मो में भी दिखता है…

उसका जवाब था कि वो या उसके पेरेंट्स कभी भी चर्च नही गए … चर्च है लेकिन जीसस में कोई आस्था नही .. वर्ल्ड वार और उसके बाद #स्टालिन ने जो किया उसमे करोडो सामान्य निर्दोष रूसी लोग मारे गए .. जिसके कारण रुसी लोगो की आस्था ईश्वर से खत्म हो गई .. और उन्होंने मान लिया कि कोई ईश्वर नही है .. अगर ईश्वर होते तो इतने निर्दोष लोगो का विनाश नही होता!
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वेब दुनिया का लेख यहा से शुरू होता है ..

हजार वर्ष पहले रूस ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। माना जाता है कि इससे पहले यहां असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था और उससे पहले संगठित रूप से वैदिक पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। वैदिक धर्म का पतन होने के कारण यहां मनमानी पूजा और पुजारियों का बोलबाला हो गया अर्थात हिन्दू धर्म का पतन हो गया। यही कारण था कि 10वीं शताब्दी के अंत में रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर चाहते थे कि उनकी रियासत के लोग देवी-देवताओं को मानना छोड़कर किसी एक ही ईश्वर की पूजा करें।

उस समय व्लादीमिर के सामने दो नए धर्म थे। एक ईसाई और दूसरा इस्लाम, क्योंकि रूस के आस-पड़ोस के देश में भी कहीं इस्लाम तो कहीं ईसाइयत का परचम लहरा चुका था। राजा के समक्ष दोनों धर्मों में से किसी एक धर्म का चुनाव करना था, तब उसने दोनों ही धर्मों की जानकारी हासिल करना शुरू कर दी।

उसने जाना कि इस्लाम की स्वर्ग की कल्पना और वहां हूरों के साथ मौज-मस्ती की बातें तो ठीक हैं लेकिन स्त्री स्वतंत्रता पर पाबंदी, शराब पर पाबंदी और खतने की प्रथा ठीक नहीं है। इस तरह की पाबंदी के बारे में जानकर वह डर गया। खासकर उसे खतना और शराब वाली बात अच्छी नहीं लगी। ऐसे में उसने इस्लाम कबूल करना रद्द कर दिया।

इसके बाद रूसी राजा व्लादीमिर ने यह तय कर लिया कि वह और उसकी कियेव रियासत की जनता ईसाई धर्म को ही अपनाएंगे। ईसाई धर्म में किसी भी तरह की पाबंदी की चर्चा नहीं थी। लोगों को स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार था और उनमें किसी भी प्रकार का सामाजिक भय भी नहीं था। उसने ईसाई धर्म अपनाने के लिए यूनानी वेजेन्टाइन चर्च से बातचीत करनी शुरू कर दी। वेजेन्टाइन चर्च कैथोलिक ईसाई धर्म से थोड़ा अलग है और उसे मूल ईसाई धर्म या आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म कहा जाता है। इस तरह रूस के एक बहुत बड़े भू-भाग पर ईसाई धर्म की शुरुआत हुई।

रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर ने जब आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी जनता से भी इस धर्म को स्वीकार करने के लिए कहा तो उसके बाद भी कई वर्षों तक रूसी जनता अपने प्राचीन देवी और देवताओं की पूजा भी करते रहे थे। बाद में ईसाई पादरियों के निरंतर प्रयासों के चलते रूस में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो सका है और धीरे-धीरे रूस के प्राचीन धर्म को नष्ट कर दिया गया।

प्राचीनकाल के रूस में लोग जिन शक्तियों की पूजा करते थे, उन्हें तथाकथित विद्वान लोग अब प्रकृति-पूजा कहकर पुकारते हैं। प्रकृति-पूजकों के लिए तो सूरज भी ईश्वर था और वायु भी ईश्वर थी और प्रकृति में होने वाला हर परिवर्तन, प्रकृति की हर ताकत को वे ईश्वर की हरकत ही समझते थे।

वे अग्नि, सूर्य, पर्वत, वायु या पवित्र पेड़ों की पूजा किया करते थे जैसा कि आज भारत में हिन्दू करता है। हालांकि वे प्रकृति को सम्मान देने के अलावा यह भी मानते थे कि कोई एक ईश्‍वर है जिसके कारण संपूर्ण संसार संचालित हो रहा है।

सबसे प्रमुख देवता थे- विद्युत देवता या बिजली देवता। आसमान में चमकने वाले इस वज्र-देवता का नाम पेरून था। कोई भी संधि या समझौता करते हुए इन पेरून देवता की ही कसमें खाई जाती थीं और उन्हीं की पूजा मुख्य पूजा मानी जाती थी। विद्वानों का कहना है कि प्राचीनकाल में रूसियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की यह पूजा बहुत कुछ हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों और रस्मों से मिलती-जुलती थी।

प्राचीनकाल में रूस के दो और देवताओं के नाम थे- रोग और स्वारोग। सूर्य देवता के उस समय के जो नाम हमें मालूम हैं, वे हैं- होर्स, यारीला और दाझबोग।

सूर्य के अलावा प्राचीनकालीन रूस में कुछ मशहूर देवियां भी थीं जिनके नाम हैं- बिरिगिन्या, दीवा, जीवा, लादा, मकोश और मरेना। प्राचीनकालीन रूस की यह मरेना नाम की देवी जाड़ों की देवी थी और उसे मौत की देवी भी माना जाता था। हिन्दी का शब्द मरना कहीं इसी मरेना देवी के नाम से तो पैदा नहीं हुआ? हो सकता है न? इसी तरह रूस का यह जीवा देवता कहीं हिन्दी का ‘जीव’ ही तो नहीं? ‘जीव’ यानी हर जीवंत आत्मा। रूस में यह जीवन की देवी थी।

रूस में आज भी पुरातत्ववेताओं को कभी-कभी खुदाई करते हुए प्राचीन रूसी देवी-देवताओं की लकड़ी या पत्थर की बनी मूर्तियां मिल जाती हैं। कुछ मूर्तियों में दुर्गा की तरह अनेक सिर और कई-कई हाथ बने होते हैं। रूस के प्राचीन देवताओं और हिन्दू देवी-देवताओं के बीच बहुत ज्यादा समानता है। यह हो सकता है कि रूस में भी पहले लोग हिन्दू ही होंगे।

लेकिन बाद में वे ईसाई और मुसलमान हो गए। लेकिन रूस के प्राचीन धर्म के बहुत से निशान अभी भी रूसी संस्कृति में बाकी रह गए हैं। रूस के विद्वान अक्सर इस बारे में लिखते हैं और इस ओर इशारा करते हैं कि रूस का पुराना धर्म और हिन्दू धर्म करीब-करीब एक जैसे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व ही रूस में वोल्गा प्रांत के स्ताराया मायना (Staraya Maina) गांव में विष्णु की मूर्ति मिली थी जिसे 7-10वीं ईस्वी सन् का बताया गया। यह गांव 1700 साल पहले एक प्राचीन और विशाल शहर हुआ करता था। स्ताराया मायना का अर्थ होता है गांवों की मां। उस काल में यहां आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी में लोग रहते थे।

माना जाता है कि रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगों के आने से पूर्व शायद वहां भारतीय होंगे या उन पर भारतीयों ने राज किया होगा।

महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है।

अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है। यह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था। चूंकि स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद स्ताराया मैना पहले स्त्री राज्य में हो। खैर…!

2007 को यह विष्णु मूर्ति पाई गई। 7 वर्षों से उत्खनन कर रहे समूह के डॉ. कोजविनका कहना है कि मूर्ति के साथ ही अब तक किए गए उत्खनन में उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र भी मिले हैं।

मौजूदा रूस की जगह पहले ग्रैंड डची ऑफ मॉस्को का गठन हुआ। आमतौर से यह माना जाता है कि ईसाई धर्म करीब 1,000 वर्ष पहले रूस के मौजूदा इलाके में फैला। यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रख्यात विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं।

यूक्रेन की राजधानी कीव से भी पहले का यह गांव 1,700 साल पहले आबाद था। अब तक कीव को रूस के सभी शहरों की जन्मस्थली माना जाता रहा है, लेकिन अब यह अवधारणा बदल गई है।

ऊल्यानफस्क स्टेट यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के रीडर डॉ. एलिग्जैंडर कोझेविन ने सरकारी न्यूज चैनल को बाताया कि हम इसे अविश्वनीय मान सकते हैं, लेकिन हमारे पास इस बात के ठोस आधार मौजूद हैं कि मध्यकालीन वोल्गा क्षे‍त्र प्राचीनकालीन रूस की मुख्य भूमि है।

डॉ. कोझेविन पिछले साल साल से मैना गांव की खुदाई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि वोल्गा की सहायक नदी स्तराया के हर स्क्वैयर मीटर जमीन अपने आप में अनोखी है और पुरातत्व का खजाना मालूम होती है।

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